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रामेश्वरम धाम में अध्यात्म के साथ-साथ पर्यटन के लिए बहुत कुछ

By डॉ. प्रभात कुमार सिंघल | LSChunav | Publish Date: 9/2/2019 3:00:37 PM
रामेश्वरम धाम में अध्यात्म के साथ-साथ पर्यटन के लिए बहुत कुछ

रामनाथस्वामी मंदिर परिसर काफी विशाल है जो करीब 6 हैक्टेयर में बना है। यहां अनेक मंदिरों की उपस्थिति इसे धार्मिक स्वरूप प्रदान करती है। मंदिर के चारों और ऊंची दीवार एवं हर तरफ भव्य कलात्मक द्वार एवं गोपुरम बने हैं। परकोटे की चौड़ाई 6 मीटर एवं ऊंचाई 9 मीटर है।

भारत के दक्षिण में तमिलनाडु राज्य में बंगाल की खाड़ी एवं अरब महासागर के संगम पर स्थित रामेश्वरम धाम हाल ही में जाने का अवसर मिला। यह देश के चार प्रमुख धामों में गिना जाता है और प्रसिद्ध 12 धार्मिक ज्योतिर्लिंगों में एक धार्मिक नगर है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रामायण कालीन इस स्थल पर सीता ने रेत के शिव लिंग की स्थापना की थी और भगवान राम ने पूजन किया था।
 
बताया जाता है कि जब राम रावण का अंत कर लौटे तो कहा गया कि उनपर ब्राह्मण हत्या का पाप लगा है और इसे मुक्त होना पड़ेगा। तब उन्होंने समुंद्र के किनारे शिवलिंग की स्थापना का मन बनाया और हनुमान को काशी जा कर शिव को लाने की आज्ञा दी। हनुमान जी को आने में कुछ देर हो गई तो सीता ने रेत का शिवलिंग बना कर स्थापना कर दी। बाद में जब हनुमान जी आये तो उनके द्वारा लाए गये शिवलिंग को भी पहले वाले शिवलिंग के पास ही स्थापित कर दिया। यही दोनों शिवलिंग आज भी मुख्य रामनाथस्वामी मंदिर में स्थापित हैं और सदियों से इनकी पूजा-दर्शन कर पुण्य कमाते आ रहे हैं।
यहां दर्शन करने से पहले समुद्र में प्रातः स्नान किया। यहां सुन्दर अग्नि स्नान घाट बनाये गए हैं। घाट पर पानी ज्यादा गहरा नहीं होने से लोग काफी दूर तक चले जाते हैं। यहां सूर्योदय का दृश्य अत्यंत लुभावना होता है। यहां श्रद्धालु तर्पण एवं पूजा आदि करते देखे जा सकते हैं। इसके उपरांत मंदिर परिसर में बने 22 पवित्र जलकुंडों का स्नान किया। मान्यता है कि इन कुओं का अस्तित्व भगवान राम के अमोध बाणों से सामने आया। उन्होंने अनेक तीर्थो का जल मंगा कर इनमें छोड़ा था। इसलिए इन्हें तीर्थ कहा जाता है। इनके नाम शंक, चक्र, गंगा, यमुना आदि धार्मिक नामों पर रखे गए हैं। किसी में बहुत ठंडा, किसी में सामान्य और किसी में हल्का गर्म पानी होता है। मान्यता है कि इन कुंड तीर्थों में अलग अलग धातुएं मिली हैं, जिसके नहाने से शरीर के रोग दूर हो जाते हैं। बाइसवें कुंड में सभी इक्कीस कुंडों का मिला जुला पानी आता है। वहीं पर कपड़े बदलने के कमरों में कपड़े बदल कर दर्शनों की लाइन में लग गए। अमूमन दो से तीन घंटे में दर्शन हो जाते हैं। 
 
मंदिर का गर्भगृह काफी अंदर है और हल्की धुंधली सी रोशनी में बहुत ध्यान से देखना होता है। दर्शनों के लिए लाइन में लगने ने पर मंदिर का धार्मिक माहौल दर्शनार्णार्थियों को बांधे रखता है। यहां शिव की पूजा और अभिषेक गंगोत्री से लाये गंगाजल से की जाती है। दर्शनार्थी भी वहां शीशियों में गंगोत्री से लाये गए गंगा जल से अभिषेक करते हैं। यहां स्वयं जल चढ़ाने की परंपरा नहीं है और पुजारी के माध्यम से ही अभिषेक किया जाता है। प्रातः काल तड़के मणि दर्शन होते हैं। यह दर्शन कम समय के लिए होते हैं अतः सुबह 5 बजे ही चले जाना उपयुक्त रहता है।
रामनाथस्वामी मंदिर के परिसर में जिस प्रकार शिव की दो मूर्तियां हैं वैसे ही देवी पार्वती की भी दो अलग-अलग मूर्तियां स्थापित की गई हैं। देवी पार्वती की एक मूर्ति पर्वतवर्धिनी एवं दूसरी विशालाक्षी कही जाती हैं। विशालाक्षी मंदिर के गर्भगृह के निकट ही विभीषण द्वारा स्थापित 9 ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं। एक विशाल नंदी मंदिर भी है। नंदी मंडप 22 फीट लंबा, 12 फीट लंबा एवं 17 फीट ऊँचा है। मंदिर के पूर्वी द्वार के बाहर विशाल हनुमान जी की मूर्ति अलग मंदिर में स्थापित है। मंदिर में सेतुमाधव का कहा जाने वाला भगवान विष्णु का मंदिर भी  प्रमुख है।
 
रामनाथस्वामी मंदिर परिसर काफी विशाल है जो करीब 6 हैक्टेयर में बना है। यहां अनेक मंदिरों की उपस्थिति इसे धार्मिक स्वरूप प्रदान करती है। मंदिर के चारों और ऊंची दीवार एवं हर तरफ भव्य कलात्मक द्वार एवं गोपुरम बने हैं। परकोटे की चौड़ाई 6 मीटर एवं ऊंचाई 9 मीटर है। मंदिर भारतीय निर्माण कला और शिल्प का बेहतरीन नमूना है। प्रवेश द्वार करीब चालीस फीट ऊंचा है। मंदिर के गलियारों में और अन्य मंदिरों में सैंकड़ों विशाल खंभे हैं जो देखने मे एक से नज़र आते हैं पर नज़दीक से पता चलता हैं हरएक की कारीगरी अलग अलग है। मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे लंबा है जो उत्तर-दक्षिण में 197 मीटर एवं पूरब-पश्चिम में 133 मीटर है। गलियारा अत्यंत कारीगरिपूर्ण है। जब धूप इस गलियारे में आती है तो इसकी पीली छंटा देखते ही बनती है।
 
रामेश्वरम नगर का स्वरूप पूरी तरह से धार्मिक एवं आध्यात्मिक है। समुद्र की उपस्थिति इसे प्राकृतिक सुंदरता से जोड़ती है। प्रमुख बाजार मंदिर के चारों ओर ही है। अधिकतर दुकानों पर समुद्री उत्तपाद सीप, शंख, मोती, मनके और इनसे बनी वस्तुएं, धार्मिक समान बेचे जाते हैं। यहां सब तरह का अच्छा भोजन आसानी से उपलब्ध है। धर्मशालाएं काफी अच्छी, साफ-सुथरी एवं बजट में हैं। यहीं पर शुद्ध सात्विक भोजन वाजिब दामों पर उपलब्ध है। कमरे का किराया 700 रुपये तक में दो बेडरूम का लगता है। हर बजट के होटल यहां मिलते हैं।
रामेश्वरम के समीप ही 3 किमी पर तंगचिमडम गांव में विल्लीरनी तीर्थ कुंड दर्शनीय है। यहां समुद्र के खारे पानी के बीच मीठा जल निकलता है। बताया जाता है कि सीता को प्यास लगने पर राम ने धनुष से इस कुंड को खोदा था। इसके समीप ही एकांत राम का एक जीर्ण मंदिर भी है। यहां राम, सीता, लक्ष्मण एवं हनुमान जी की कई मूर्तियां हैं। रामनवमी पर्व पर ही यहां कुछ चहल पहल रहती है बाकी दिनों में लोग कम ही आते हैं। रामनाथस्वामी मंदिर से करीब 8 किमी दूरी पर कोदण्ड स्वामी मंदिर दर्शनीय है। यहां पर राम, सीता, लक्ष्मण एवं विभीषण की मूर्तियां दर्शनीय हैं। बताया जाता है राम ने यहां विभीषण को शरण दी थी और राम ने रावण का अंत करने के बाद विभीषण को लंका का राजा घोषित किया था। इसके आगे धनुष कोटि का विशाल समुंद्र तो बस एक टक देखते ही रहो। इस से पहले है भुतहा धनुष कोटि जो कभी समृद्ध नगर था पर 1964 के समुंद्री तूफान में पूरी तरह नष्ट हो गया। रामेश्वरम धाम एवं आसपास की धार्मिक यात्रा सभी के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव रहेगा।
 
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
 


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