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योगी को चुनौती देने से पहले वोट अंतर कम करने पर ध्यान दें प्रियंका

By अनुराग गुप्ता | LSChunav | Publish Date: Jul 1 2019 1:18PM
योगी को चुनौती देने से पहले वोट अंतर कम करने पर ध्यान दें प्रियंका

कांग्रेस ने एक तरफ तो पार्टी को मजबूत करने का बीड़ा उठा रखा है तो दूसरी तरफ प्रियंका गांधी ने अपना पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश की तरफ लगा लिया है। पिछले कुछ दिनों से प्रियंका प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ से लोहा ले रहीं हैं और मिशन 2022 को लेकर अपनी पूरी ताकत लगाए हुए हैं।

लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद अब कांग्रेस पार्टी का पूरा ध्यान 20022 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव पर है। पार्टी ने हाल ही में सभी जिला समितियों को भंग कर दिया और फिर संगठन प्रभारी केसी वेणुगोपाल द्वारा एक बयान जारी किया जाता है कि उत्तर प्रदेश की पूर्वी प्रभारी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा और पश्चिम के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिधिंया के सुझाव के बाद ऐसा किया गया। समितियां भंग करने के बाद अब कांग्रेस ने विधायक दल के नेता अजय कुमार लल्लू को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया और नए सिरे से संगठन में बदलाव करने की जिम्मेदारी सौंपी। हालांकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी का नाम जल्द ही घोषित किया जा सकता है। 

कांग्रेस ने एक तरफ तो पार्टी को मजबूत करने का बीड़ा उठा रखा है तो दूसरी तरफ प्रियंका गांधी ने अपना पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश की तरफ लगा लिया है। पिछले कुछ दिनों से प्रियंका प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ से लोहा ले रहीं हैं और मिशन 2022 को लेकर अपनी पूरी ताकत लगाए हुए हैं। राहुल गांधी द्वारा उत्तर प्रदेश से दूरी बनाए जाने के बाद से प्रियंका की जिम्मेदारी पहले से ज्यादा बढ़ गई है। इसीलिए वह अपना पूरा ध्यान किसानों और नौजवानों की तरफ बनाए हुए हैं। 

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दरअसल प्रियंका किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या, बेरोजगार नौजवानों और प्रदेश में बढ़ते हुए अपराधों के लिए लगातार प्रदेश सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए अपनी जमीन तलाशने की कोशिश कर रही हैं। इन तमाम मुद्दों को लेकर वह ट्विटर के जरिए योगी सरकार को घेरने में जरा भी चूक नहीं करती हैं। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रियंका को जवाब देते हुए कहा कि उनको दिल्ली, इटली या फिर इंग्लैंड में बैठकर सुर्खियों में बने रहने के लिए कुछ न कुछ करना ही होता है।

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यह खट्टे अंगूर का मामला है। उनकी पार्टी के अध्यक्ष यूपी से हार गए, इसलिए दिल्ली, इटली या इंग्लैंड में बैठे हैं। योगी ने दावा किया कि पिछले दो वर्षों में प्रदेश की कानून व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन आया है। अच्छी कानून व्यवस्था के चलते हमारा प्रदेश निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बना है और यहां भारी मात्रा में निवेश हो रहा है।

प्रियंका के सभी आरोपों को योगी ने खारिज करते हुए पत्रकारों को बताया कि सरकार ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को प्रतिमाह उद्यमियों की स्थानीय स्तर की समस्याओं का मुस्तैदी से समाधान करने के निर्देश दिये हैं। निवेशकों को बढ़ावा देने के लिए भी सरकार ने कदम उठाये हैं। अब किसी भी निवेशक को लखनऊ आने की जरूरत नहीं है। निवेशक अपनी सम्पूर्ण जानकारी ऑनलाइन देकर लाभ उठा सकता है।

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कानून व्यवस्था की पिछले दिनों समीक्षा करते हुए योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को चुस्त और दुरुस्त रहने के लिए कहा। इसके साथ ही कहा कि जनकल्याणकारी योजनाओं को कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जाएगा। पिछले दिनों प्रियंका ने गन्ना किसानों को उनके बकाये का भुगतान नहीं मिलने पर भी योगी सरकार को निशाने पर लिया जिसके जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान सरकार गन्ना किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए हमेशा तत्पर है। सरकार की मंशा है कि हर हाल में किसानों के गन्ना मूल्य का शत-प्रतिशत भुगतान हो। सरकार ने पिछले दो वर्ष में लगभग 70 हजार करोड़ रुपये के बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान कराया है, जो अपने आप में एक उपलब्धि है।

आखिर क्यों आमने-सामने हैं योगी और प्रियंका

बदहाल कानून व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े करने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेसी नेता उत्तर प्रदेश में पार्टी के संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर देखते हैं और ऐसा माना जा रहा है कि पार्टी के पास अभी 2 साल का वक्त है ऐसे में जनता के बीच जा-जाकर लोगों को सरकार की नाकामियों को गिनाया जाए और यह बताया जाए कि आखिर सरकार ने आपको किन-किन सुविधाओं से वंचित रखा। अगर ऐसा पार्टी कर लेती है तो उसका फायदा 2022 के चुनावों में मिल सकता है।

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राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि हाल ही में लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से तो कांग्रेस पार्टी बंटी-बंटी सी प्रतीत होती है और बात उत्तर प्रदेश की कि जाए तो यहां पर नेता हार की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर थोप रहे हैं। साथ ही कार्यकर्ताओं द्वारा आरोप लगाया जा रहा था कि प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर लखनऊ स्थित मुख्यालय में बैठते तक नहीं हैं। ऐसे में पार्टी कैसे अपनी स्थिति को मजबूत कर सकती है।  इतना ही नहीं राहुल गांधी द्वारा अमेठी गंवा देने के बाद से प्रियंका गांधी वाड्रा को ही उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन पार्टी इस बात को भूल गई कि अभी प्रदेश में बहुत ज्यादा काम करना होगा क्योंकि प्रियंका की अगुवाई में पार्टी ने लगभग सभी सीटों को गंवा दिया और उत्तर प्रदेश की सिर्फ रायबरेली सीट पर ही जीत दर्ज हुई।

प्रियंका गांधी और योगी आदित्यनाथ के आमने-सामने होने के पीछे का तथ्य यह बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में प्रियंका मुख्यमंत्री उम्मीदवार बन सकती हैं। जबकि भाजपा योगी आदित्यनाथ के काम को गिनाकर प्रदेश में वापिसी का प्रयास करेगी। हालांकि अभी चुनाव में काफी वक्त है और राजनीति में तो हर एक दिन बहुत ज्यादा कीमती होता है। पार्टी का ध्यान उन 12 विधानसभा सीटों पर भी हैं जहां पर उप चुनाव होने वाले हैं क्योंकि इस चुनाव में सभी पार्टियां अपने दम पर मैदान पर उतरेंगी।

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कांग्रेस की नजर क्षेत्रीय नेताओं को अपनी तरफ लाने पर 

कांग्रेस की नजरें प्रदेश के किसान नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं को अपने पाले में लाने की है। कांग्रेस इन लोगों को शामिल करके संगठन को निचले स्तर से मजबूत बनाने का प्रयास करेगी। साथ ही पार्टी विधानसभा चुनाव के लिए ओबीसी और एससी समुदाय के नेताओं की हिस्सेदारी को सुनिश्चित करेगी। हाल के लोकसभा चुनाव से तजुर्बा पाकर प्रियंका इस बार निचले स्तर से पार्टी को मजबूत करने के प्रयास में जुट गई हैं क्योंकि उनको अब इस बात की अनुभूति तो हो ही गई है कि सिर्फ बयानबाजी से काम नहीं चलने वाला है पार्टी को मजबूत करने के लिए हाथ-पैर तो मारने ही पड़ेंगे।

चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी को 49.6 प्रतिशत, जबकि कांग्रेस को 6.31 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। ऐसे में साफ नजर आ रहा है कि कांग्रेस पार्टी को कितना ज्यादा परिश्रम करने की आवश्यकता है। हालांकि प्रियंका गांधी अब भारतीय जनता पार्टी के रास्ते पर निकल पड़ी हैं और पार्टी के लिए युवा चेहरों की तलाश कर रही हैं। उन्होंने कांग्रेस नेताओं को साफ कर दिया कि जिला कमेटियों के लिए आप सभी 40 वर्ष या इससे कम आयु के नेताओं की तलाश करें ताकि युवा जोश के साथ-साथ सामाजिक समीकरण पर भी ध्यान दिया जा सके।


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