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गंवाई मुख्यमंत्री की कुर्सी, अब राजनीतिक भविष्य पर संकट मंडराया

By अंकित सिंह | LSChunav | Publish Date: 11/28/2019 5:48:12 PM
गंवाई मुख्यमंत्री की कुर्सी, अब राजनीतिक भविष्य पर संकट मंडराया

2014 में भाजपा नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सत्ता में आयी तो 2019 में भी उन्हीं की अगुवाई में सत्ता वापसी में कामयाब रही। लेकिन प्रदेशों में पार्टी के साथ ऐसा कुछ नहीं रहा जो सीएम एक बार पूर्व हो गए हैं उनकी वापसी पर ग्रहण सा लग गया है।

 राजनीति में जो पूर्व होता है वह वर्तमान भी हो जाता है और जो वर्तमान में होता है वह पूर्व भी हो जाता है। कहने का मतलब यह है कि राजनीति में संभावनाओं का द्वार हमेशा खुला रहता है। जो वर्तमान में जिस पद पर है वह पूर्व हो जाता है और जो पूर्व में किसी पद पर रह चुका है वह वर्तमान में वापसी भी कर लेता है। लेकिन भाजपा के साथ ऐसा बहुत कम देखने को मिला है। राष्ट्रीय स्तर पर बात करें तो भले ही भाजपा अपने पूर्व प्रधानमंत्रियों को वापस सत्ता में लाने में कामयाब रही लेकिन वह जब तक जीतते रहें तब तक तो लगातार बने रहें। 13 दिन की सरकार जाने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के ही नाम पर 1998 में भाजपा ने चुनाव लड़ा था। भाजपा ने चुनाव में जीत दर्ज किया। 1 साल बाद वापस उनके ही नाम पर पार्टी ने चुनाव लड़ा और इस बार भी पार्टी ने जीत दर्ज की। हालांकि 2004 में हारने के बाद वाजपेयी सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके थे लेकिन पूर्व उप प्रधानमंत्री होने के नाते लालकृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री होने की संभावनाएं काफी दिख रही थी। पार्टी ने 2009 का चुनाव उनके नाम पर लड़ा लेकिन जनादेश नहीं मिल सका और आडवाणी पूर्व उप प्रधानमंत्री ही बने रहे।

2014 में भाजपा नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सत्ता में आयी तो 2019 में भी उन्हीं की अगुवाई में सत्ता वापसी में कामयाब रही। लेकिन प्रदेशों में पार्टी के साथ ऐसा कुछ नहीं रहा जो सीएम एक बार पूर्व हो गए हैं उनकी वापसी पर ग्रहण सा लग गया है। यह खास करके वर्तमान समय में देखने को भी मिल रहा है। मध्यप्रदेश में हार के बाद शिवराज सिंह चौहान पूर्व मुख्यमंत्री तो है लेकिन आगे मुख्यमंत्री के बनने की संभावनाएं उनकी कितनी है इस पर एक ग्रहण सा है। पार्टी में कम होते उनके दबदबे का एहसास उन्हें भी है तभी वह मध्यप्रदेश में ही मोर्चा संभाले रखने का दावा करते हैं। राज्य में पार्टी उनके समानांतर कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्र और राकेश सिंह को खड़ा कर रही है। छत्तीसगढ़ की बात करें तो बुरी तरीके से परास्त होने के बाद 15 साल से मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह का भी राजनीतिक कॅरियर दांव पर लग गया है। रमन सिंह की राजनीतिक सक्रियता भी कम हो गई है। लोकसभा चुनाव में उन्हें और ना ही उनके पूर्व सांसद बेटे को पार्टी ने टिकट दिया। ऐसा माना जा रहा है कि रमन सिंह की जगह पार्टी छत्तीसगढ़ में किसी नए चेहरे की तलाश में लग गई है।
राजस्थान में भाजपा के कई मौकों पर कमान संभालने वाली वसुंधरा राजे फिलहाल पूर्व मुख्यमंत्री हैं। भैरों सिंह शेखावत के बाद दो बार प्रदेश की कमान संभालने वाली वसुंधरा राजे सक्रिय राजनीति से दूर नजर आती हैं। या यूं कह सकते हैं कि पार्टी ने उन्हें वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य से दूर ही रखने का फैसला लिया है। 'मोदी से बैर नहीं वसुंधरा तेरी खैर नहीं' का नारा पार्टी अध्यक्ष को भी समझ में आने लगा है कि वसुंधरा से पार्टी कार्यकर्ता ही नाराज चल रहे थे। इसलिए ऐसा माना जा रहा है कि वसुंधरा के भी राजनीतिक कॅरियर पर संकट मंडरा रहा है। राजस्थान में उन्हें गजेंद्र सिंह शेखावत और राज्यवर्धन सिंह राठौर के अलावा ओपी माथुर से भी कड़ी चुनौती मिल रही है। यानी कि पार्टी ने इन तीन नेताओं को वसुंधरा के समानांतर खड़ा करने का फैसला लिया है।
लेकिन इस सवाल का जिक्र हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि महाराष्ट्र की 5 साल के सरकार की कमान संभालने के बाद देवेंद्र फडणवीस पूर्व मुख्यमंत्री हो चुके हैं। क्या कभी भाजपा को सत्ता में आने का मौका मिले तो उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनाया जाएगा? इसका जवाब तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही दे सकेंगे। लेकिन उनके लिए आगे का रास्ता चुनौती भरा जरूर हो गया है। कुछ लोग ऐसा भी कह रहे हैं कि महाराष्ट्र में तीन-चार दिनों की राजनीतिक उथल-पुथल में देवेंद्र फडणवीस की हार हुई है क्योंकि उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व को गलत इनपुट दिए हैं। देवेंद्र फडणवीस के पक्ष में एक बात यह जाती है कि वह संघ के करीबी भी हैं और युवा भी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भी विश्वसनीय माने जाते हैं। ऐसे में उन्हें एक मौका और दिया जा सकता है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि उन्हें केंद्र में लाकर राज्य में किसी और को आगे किया जा सकता है।
हालांकि ऐसा नहीं है कि भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को दोबारा सत्ता नहीं सौंपी है। कर्नाटक में बीएस येदुरप्पा का उदाहरण देख लीजिए। उन्हें वर्तमान समय में ही कर्नाटक की बागडोर अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने सौंपी है जबकि वह 75 साल से ऊपर के हैं। ऐसा भी नहीं है कि कर्नाटक में भाजपा के पास कोई दूसरा नेता नहीं है। लेकिन कुछ राजनीतिक मजबूरियों के कारण येदुरप्पा आलाकमान का विश्वास जीतने में कामयाब रहते हैं। गुजरात में देखा जाए तो केशुभाई पटेल को भी दोबारा सीएम की कुर्सी दी गई लेकिन वह ज्यादा दिन तक चल नहीं पाए। पार्टी से ही उन्होंने बगावत कर लिया। यही हाल उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिला। कल्याण सिंह दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बने लेकिन पार्टी ने जब उन्हें सीएम पद से हटाया तो उन्होंने बगावत कर दूसरी पार्टी बना ली।
राजनीतिक अनिश्चितताओं का खेल है। यहां कब, कौन, किस तरह का पाला बदल ले कहना मुश्किल है। कौन कब किस समय राजनीतिक मजबूरी बन कर उभर जाए इसका भी अनुमान लगाना मुश्किल है। लेकिन वर्तमान परिस्थिति में देखें तो भाजपा नए चेहरों पर दांव लगाने में विश्वास रखती है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, असम, त्रिपुरा या फिर झारखंड जैसे तमाम ऐसे राज्य हैं जहां पार्टी ने नए चेहरों को मौका दिया। अब देखना दिलचस्प होगा कि जिन राज्यों में पूर्व सीएम है जो अभी भी सक्रिय राजनीति में है उनको हटाकर कैसे नये चेहरों को पार्टी आगे बढ़ाती है। 
 

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