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लद्दाखवासियों की मुराद पूरी, पर करगिल वाले लेह से होना चाहते हैं अलग

By सुरेश एस डुग्गर | LSChunav | Publish Date: Aug 5 2019 5:31PM
लद्दाखवासियों की मुराद पूरी, पर करगिल वाले लेह से होना चाहते हैं अलग

केंद्र शासित प्रदेश की मांग को लेकर लेह व कारगिल जिलों में राजनीतिक पार्टियों के साथ लोग भी एकजुट थे। वर्ष 2002 में लद्दाख यूनियन टेरेटरी फ्रंट के गठन के साथ इस मांग को लेकर सियासत तेज हो गई थी।

जम्मू। लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के केंद्र के फैसले से लद्दाख के लोगों में खुशी का माहौल है क्योंकि उनके मन की मुराद पूरी हुई है। पर यह खुशी सिर्फ लेह के लोगों को है जिन्होंने इसे पाने की खातिर कई सालों से आंदोलन छेड़ रखा था और करगिल के लोग लेह से मुक्ति पाना चाहते हैं। जानकारी के लिए लद्दाख संभाग के दो जिले लेह और करगिल हैं। वर्ष 1947 से क्षेत्र में यह मांग बुलंद हो रही थी कि लद्दाख को कश्मीर से अलग कर इस केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए। अब भाजपा ने यह मांग पूरी कर अपना वायदा निभाया है। वर्ष 1989 में लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन ने अपने गठन के साथ ही इस मांग को लेकर एकजुट होकर आंदोलन छेड़ दिया था। 

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केंद्र शासित प्रदेश की मांग को लेकर लेह व कारगिल जिलों में राजनीतिक पार्टियों के साथ लोग भी एकजुट थे। वर्ष 2002 में लद्दाख यूनियन टेरेटरी फ्रंट के गठन के साथ इस मांग को लेकर सियासत तेज हो गई थी। वर्ष 2005 में लद्दाख यूनियन टेरेटरी फ्रंट ने लेह हिल डेवेलपमेंट काउंसिल की 26 में से 24 सीटें जीत ली थी। इसके बाद से लद्दाख ने इस मांग को लेकर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। इसी मुद्दे को लेकर वर्ष 2004, 2014 व 2019 में लद्दाख ने सांसद जिताकर दिल्ली भेजे थे। वर्ष 2004 में लद्दाख यूनियन टेरेटरी फ्रंट के उम्मीदवार थुप्स्तन छेवांग सांसद बनकर लद्दाख पहुंचे थे। इसके बाद वह वह 2014 में भाजपा के उम्मीदवार के रूप में लद्दाख से फिर सांसद बने। अब वर्ष 2019 में यूनियन टेरेटरी फ्रंट की मांग को लेकर चुनाव लड़ने वाले भाजपा के जामियांग त्सीरिंग नांग्याल सांसद बने।

लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के मुद्दे पर दो बार सांसद चुने गए थुप्स्तन छेवांग लद्दाख की जीत के असली हीरो हैं। पिछले चालीस सालों से केंद्र शासित प्रदेश की मांग को लेकर जद्दोजहद करने वाले छेवांग ने वर्ष 1989 में लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन की कमान संभाली थी। उन्होंने वर्ष 2002 में लद्दाख यूनियन टेरेटरी फ्रंट बनाने में भी मुख्य भूमिका निभाई। वर्ष 2010 केंद्र शासित प्रदेश की मांग को पूरा करने के लिए फ्रंट ने भाजपा में शामिल होने का फैसला किया। भाजपा में आने के बाद वर्ष 2014 में सांसद के रूप में भी छेवांग यूटी के लिए पार्टी पर दवाब बनाते आए। ऐसे में जब एनडीए के पहले कार्यकाल में उन्हें यह मांग पूरी होती नहीं दिखी तो उन्होंने विरोध में सांसद के पद से इस्तीफा दे दिया। बहुत मनाने के बाद भी वह 2019 में भाजपा के उम्मीदवार बनने के लिए तैयार नही हुए।

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लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के केंद्र सरकार के फैसले से बहुत खुश हुए छंवांग ने बताया कि क्षेत्र की एक बहुत पुरानी मांग पूरी हुई है। भाजपा ने अपना वायदा पूरा कर दिखाया। उनका कहना है कि आज किसी को लद्दाख में अंदाजा तक नही था ऐसे एक झटके में सत्तर साल पुरानी मांग पूरी हो जाएगी। लद्दाख के लोगों को इस जीत का श्रेय देते हुए उन्होंने कहा कि लोगों ने एकजुट होकर मुहिम चलाई और इसे निर्णायक दौर तक पहुंचाया।

नए केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के बारे में

लद्दाख एक ऊंचा पठार है जिसका अधिकतर हिस्सा 3,500 मीटर (9,800 फीट) से ऊंचा है। यह हिमालय और कराकोरम पर्वत श्रृंखला और सिन्धु नदी की ऊपरी घाटी में फैला है। करीब 33,554 वर्गमील में फैले लद्दाख में बसने लायक जगह बेहद कम है। यहां हर ओर ऊंचे-ऊंचे विशालकाय पथरीले पहाड़ और मैदान हैं। यहां के सभी धर्मों के लोगों की जनसंख्या मिलाकर 2,36,539 है। ऐसा माना जाता है कि लद्दाख मूल रूप से किसी बड़ी झील का एक डूब हिस्सा था है, जो कई वर्षों के भौगोलिक परिवर्तन के कारण लद्दाख की घाटी बन गया। 18वीं शताब्दी में लद्दाख और बाल्टिस्तान को जम्मू और कश्मीर के क्षेत्र में शामिल किया गया। 1947 में भारत के विभाजन के बाद बाल्टिस्तान, पाकिस्तान का हिस्सा बना।

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लद्दाख के पूर्वी हिस्से में लेह के आसपास रहने वाले निवासी मुख्यतः तिब्बती, बौद्ध और भारतीय हिन्दू हैं, लेकिन पश्चिम में करगिल के आसपास जनसंख्या मुख्यत: भारतीय शिया मुस्लिमों की है। तिब्बत पर कब्जे के दौरान बहुत से तिब्बती यहां आकर बस गए थे। लद्दाख को चीन, तिब्बत का हिस्सा मानता है। सिन्धु नदी लद्दाख से निकलकर ही पाकिस्तान के कराची तक बहती है। प्राचीनकाल में लद्दाख कई अहम व्यापारिक रास्तों का प्रमुख केंद्र था। लद्दाख मध्य एशिया से कारोबार का एक बड़ा गढ़ था। सिल्क रूट की एक शाखा लद्दाख से होकर गुजरती थी। दूसरे मुल्कों के कारवें के साथ सैकड़ों ऊंट, घोड़े, खच्चर, रेशम और कालीन लाए जाते थे जबकि हिन्दुस्तान से रंग, मसाले आदि बेचे जाते थे। तिब्बत से भी याक पर ऊन, पश्मीना वगैरह लादकर लोग लेह तक आते थे। यहां से इसे कश्मीर लाकर बेहतरीन शॉलें बनाई जाती थीं।


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