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पत्नी और लिव इन पार्टनर के साथ रहने वाले 7 बार से सांसद महेंद प्रसाद क्यों हैं विवादों में

By अनुराग गुप्ता | LSChunav | Publish Date: Sep 24 2019 2:22PM
पत्नी और लिव इन पार्टनर के साथ रहने वाले 7 बार से सांसद महेंद प्रसाद क्यों हैं विवादों में

पत्नी और लिव इन पत्नी के साथ दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास में अपना जीवन व्यापन करने वाले महेंद्र प्रसाद 7 बार से लगातार राज्यसभा सांसद हैं।

जनता दल (यूनाइटेड) के राज्यसभा सांसद और अरबपति बिजनेस टॉयकून डॉ. महेंद्र प्रसाद जो अपनी पत्नी और लिव इन पाटर्नर उमा देवी के साथ दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास में रहते हैं उससे जुड़ा हुआ मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। दरअसल, लिव इन पाटर्नर उमा देवी पत्नी के तौर पर 45 साल से महेंद्र प्रसाद और उनकी धर्मपत्नी के साथ रह रही थीं और हाई कोर्ट के फैसले में उन्हें घर छोड़ने के लिए कहा गया। जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह मामला बेहद जटिल पारिवारिक विवाद है, जो सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है।

कौन हैं महेंद्र प्रसाद ?

पत्नी और लिव इन पत्नी के साथ दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास में अपना जीवन व्यापन करने वाले महेंद्र प्रसाद 7 बार से लगातार राज्यसभा सांसद हैं। वो आज तक कभी भी राज्यसभा का चुनाव नहीं हारे। यहां तक की साल 2012 में उन्होंने कहा था कि अगर राज्य सभा में एक ही सीट खाली होती, तो भी मैं ही चुना जाता। इस आत्मविश्वास के साथ अपना जीवन व्यतीत करने वाले महेंद्र प्रसाद फार्मा क्षेत्र के बिजनेस टायकून हैं।

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साल 1940 में बिहार के जहानाबाद जिले के गोविंदपुर गांव में जन्मे महेंद्र प्रसाद का जन्म भूमिहार परिवार में हुआ था। छोटी उम्र में बड़ा सपना लेकर महेंद्र प्रसाद मुंबई चले थे और वहां पर अपने सपनों को पूरा करने की कवायद में जुट गए। एक वेबसाइट से मुताबिक साल 1971 में महेंद्र प्रसाद ने अपनी खुद की फैक्ट्री की नींव रखी थी। समय का चक्र चलता गया और उन्होंने लगभग 4000 करोड़ रुपए की अपनी संपत्ति बना ली।

राजनीतिक सफर की शुरुआत

साल 1980 में पहली बार कांग्रेस की टिकट पर जहानाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतने के बाद संसद पहुंचे महेंद्र प्रसाद को साल 1984 में अपनी सीट गंवानी पड़ी थी। तत्पश्चात राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए साल 1985 में वह पहली बार राज्यसभा के लिए नामित हुए और फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। समय बदला पार्टियां बदलीं लेकिन महेंद्र प्रसाद बिहार से राज्यसभा में बैठे रहे। कांग्रेस से शुरुआत करने के बाद, जनता दल और फिर राष्ट्रीय जनता दल की सीट से पहुंचे। लेकिन उन्हें संतोष नहीं मिला था। अंतत: महेंद्र प्रसाद को उनके मन की पार्टी मिल गई और वे पिछली चार बार से जनता दल (यूनाइटेड) के राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में चुने जा रहे हैं।  

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नीतीश को CM बनाने में निभाई थी मुख्य भूमिका

साल 1999 में जनता दल भंग होने के बाद जॉर्ज फर्नांडिस की अगुआई वाला एक गुट समता दल से मिल गया और बाद में लोकशक्ति पार्टी भी इसमें शामिल हो गई थी। इन तमाम दलों को मिलकर बना था जनता दल (यूनाइटेड)... 

अब बात आती है नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बनने की। साल था 2005 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए ने  बिहार चुनावों में मुख्यमंत्री पद उम्मीदवार के तौर पर नीतीश कुमार के नाम की घोषणा कर दी थी। ऐसे में जेडी(यू) के भीतर दरार पैदा होने लगी और जॉर्ज फर्नांडिस ने चुनाव के लिए नीतीश के साथ संसाधन साझा करने से मना कर दिया था तब नेताओं ने नीतीश कुमार को महेंद्र प्रसाद का नाम सुझाया।

सुझाव मिलने के तुरंत बाद नीतीश कुमार ने राजीव रंजन सिंह उर्फ लल्लन सिंह से कहा। तब उन्होंने महेंद्र प्रसाद से बातचीत की। बातचीत का सिलसिला बढ़ता चला गया और 2-4 बैठकों के बाद महेंद्र प्रसाद दल बदलने के लिए तैयार हो गए। 

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अब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन गए थे और उन्होंने साल 2005 में जेडी(यू) की टिकट पर महेंद्र प्रसाद को राज्यसभा भेज दिया और तब से लेकर आजतक वह जेडी(यू) का ही प्रतिनिधित्व करते आए हैं।

नेताओं से मिली जानकारी के मुताबिक महेंद्र प्रसाद नीतीश कुमार के करीबी बताए जाते हैं और इसके पीछे की वजह अरबपति महेंद्र प्रसाद की ओर से पार्टी को निरंतर मिलने वाला 'सहयोग' बताया जाता है।  एक नेता ने बताया कि प्रसाद कभी भी पद के लालच में नहीं रहते और जब कभी राजनीतिक दलों को आर्थिक मदद के लिए उनकी जरूरत होती है। प्रसाद ने कभी भी किसी को निराश नहीं किया।

बाल-बाल बची थी जान

1985 में पहली बार कांग्रेस की टिकट पर राज्यसभा पहुंचे महेंद्र प्रसाद की जान बाल-बाल बची थी। यह ऐसा वक्त था जब पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर पहुंच चुका था और उस वक्त कांग्रेस ने महेंद्र प्रसाद को अमृतसर की लोकसभा सीट के लिए एक आब्जर्वर के तौर पर भेजा था। बाटला में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक सभा थी और उनकी कार में धमाका हो गया। लेकिन वह बाल-बाल बच गए थे। 


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