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कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व और BJP के सॉफ्ट सेक्युलरिज़्म से डर CPM ने सबरीमाला पर लिया U-Turn

By अभिनय आकाश | LSChunav | Publish Date: 11/16/2019 12:42:52 PM
कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व और BJP के सॉफ्ट सेक्युलरिज़्म से डर CPM ने सबरीमाला पर लिया U-Turn

सीपीएम राज्य सचिवालय ने केरल की एलडीएफ सरकार को सलाह दी है कि उसे सभी आयु वर्गों की महिलाओं को मंदिर में एंट्री दिलाने पर ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए।

धर्म और आध्यात्म एक ऐसा विषय है जिसकी हर व्यक्ति को तलाश रहती है। हर व्यक्ति इस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है सबरीमाला का मंदिर। यहां हर दिन लाखों लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। इस मंदिर को विश्व के सबसे बड़े तीर्थ स्थानों में से एक माना जाता है। इस मंदिर में महिलाओं का आना वर्जित है। इसके पीछे मान्‍यता ये है कि यहां जिस भगवान की पूजा होती है (श्री अयप्‍पा), वे ब्रह्मचारी थे इसलिए यहां 10 से 50 साल तक की लड़कियां और महिलाएं नहीं प्रवेश कर सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर दायर 56 पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला बड़ी बेंच को सौंप दिया है। कोर्ट इस बारे में फैसला सुनाने वाला था लेकिन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई समेत 5 जजों की बेंच ने कहा कि परंपराएं धर्म के सर्वमान्य नियमों के मुताबिक हों और आगे 7 जजों की बेंच इस बारे में अपना फैसला सुनाएगी।

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साफ है कि फिलहाल मंदिर में कोर्ट के पुराने फैसले के मुताबिक महिलाओं की एंट्री जारी रहेगी। कोर्ट में इस मुद्दे पर राय बंटी नजर आई, 5 जजों की बेंच के 2 जज पुनर्विचार याचिका को खारिज करने के पक्ष में थे लेकिन बाकी जजों ने इस मुद्दे को बड़ी बेंच के पास भेजने का फैसला बहुमत के आधार पर लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह मामला सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं है, मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश, धर्म से बाहर शादी करने वाली पारसी औरतों के टावर आफ साइलेंस में प्रवेश और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (महिलाओं का खतना) किया जाना। ये सब मामले भी सबरीमाला की तरह हैं। इन सभी मामलों पर कोर्ट की एक बड़ी बेंच को विचार करना चाहिए। 

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गौरतलब है कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और तीन जजों की बेंच जिसमें नए चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एसए नजीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी शामिल हैं, वह कर रही है। 
 
जहां तक बात सबरीमाला की है तो इस मामले पर केंद्र से लेकर राज्य तक जमकर राजनीति चल रही है। केरल में भाजपा और कांग्रेस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ हैं और पिनराई विजयन की कम्युनिस्ट सरकार समर्थन में नजर आ रही थी। जिसके पीछे वो दलील देते नजर आते थे कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन वर्तमान दौर में सीपीएम अपने स्टैंड से अलग रूख अपनाती नजर आ रही है। खबरों के अनुसार सीपीएम राज्य सचिवालय ने केरल की एलडीएफ सरकार को सलाह दी है कि उसे सभी आयु वर्गों की महिलाओं को मंदिर में एंट्री दिलाने पर ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए। सीपीएम ने राज्य सरकार को केरल में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसा करने की सलाह दी है। सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केरल सरकार ने तमाम विरोध के बीच महिलाओं को मंदिर में एंट्री दिलवाई थी और उसका वीडियो भी जारी किया था। इसके पीछे की वजह राज्य में 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव भी हैं।
लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य में जिस तरह से कांग्रेस ने अपनी स्थिति को मजबूत किया है, इसके पीछे सबरीमाला पर पार्टी के स्टैंड ने भी अहम भूमिका निभाई है। ज्ञात हो कि सबरीमाला के मुद्दे पर कांग्रेस की राज्य ईकाई और केंद्रीय नेतृत्व दोनों की राय भिन्न थी। लेकिन आम चुनाव में कांग्रेस को मिली सफलता और उनके साफ्ट हिंदुत्व पर लोगों का भरोसा जागने से सीपीएम जो कभी महिलाओं के दर्शन करने की वीडियो जारी करती थी घबरा गई है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने केरल की पिनराई विजयन सरकार को सलाह दी है कि वह सबरीमाला मंदिर जाने वाली महिलाओं को सुरक्षा देने को लेकर बहुत ज्यादा दिलचस्पी न ले।
राज्य सरकार ने भी पार्टी की सलाह पर अमल करना शुरु कर दिया है। जिसकी बानगी केरल सरकार के मंत्री के बयानों में दिखने भी लगी है। केरल के देवास्वोम मंत्री कडकमपल्ली सुरेंद्रन ने कहा कि अगर कोई महिला सबरीमाला तक जाने के लिए पुलिस सुरक्षा चाहती है तो उसे कोर्ट का आदेश लाना होगा। मंत्री सुरेंद्रन ने स्पष्ट किया कि इस बार राज्य सरकार उन महिलाओं को किसी तरह की रियायत नहीं देगी, जो पहले ही मंदिर जाने का मन बना चुकी हैं। राज्य सरकार के मंत्री ने सामाजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाई को भी निशाने पर लेते हुए अपना रुख साफ कर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार इस साल सामाजिक कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह के ऐक्टिविजम की इजाजत नहीं देगी। तृप्ति देसाई जैसे लोग इसे अपनी ताकत दिखाने के मौके के तौर पर न देखें। सबरीमाला ऐसे ड्रामों को दिखाने की जगह नहीं है।
 
खबरों के अनुसार राज्य सरकार को बताया गया कि मंदिर जाने वाली महिलाओं को पुलिस सुरक्षा देना राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। वहीं बीजेपी इससे पहले तक सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ नजर आ रही थी लेकिन जब कोर्ट ने खुद ही अपने फैसले पर पुनर्विचार की बात कही तो बीजेपी की तरफ से संतुष्टि का भाव नजर आया। पार्टी की तरफ से पार्टी के संगठन महासचिव बीएल संतोष ने फैसले पर संतोष जताते हुए कहा कि ये मामला मूलभूत अधिकारों का नहीं परंपरा का था। राम माधव ने भी ट्वीट कर कहा कि केरल सरकार को अब इस मामले को और नहीं बढ़ाना चाहिए। बहरहाल, 7 जजों को बैठ कर अब ये तय करना है कि महिलाएं मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं या नहीं? ये संविधान तय करेगा या वहां की परंपराओं की व्याख्या करने वाले पुरोहित और भक्त इसका पता तो आने वाले वक्त में ही चलेगा।

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